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जब हमारे मन की तरंगें तूफानी रूप ले लेती हैं तब अध्यात्म ही इसे शांत शील में परिवर्तित कर सकता है। अध्यात्म ही सांसारिकता के बंधनों में जकड़े मनुष्य को ईश्वर की समीपता का आभास कराता है। भौतिकता से हम क्षणिक बाहरी आनंद तो आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, पर यह स्थायी नहीं होता।

अध्यात्म मनुष्य को स्थायी आंतरिक आनंद प्रदान करता है। हमारा आवश्यकता से अधिक सांसारिक होना आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति में एक बड़ा अवरोध है। सांसारिकता में घिरे रहने से हमारे इहलोक और परलोक दोनों बिगड़ सकते हैं। सांसारिकता मनुष्य को पूर्णतः भौतिकवादी बना देती है। हालाँकि ऐसी आशंकाएँ भी व्यक्त की जाती हैं कि आध्यात्मिकता पर ज्यादा जोर देने से सांसारिक व्यवहारों में परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, पर बुद्धिमान व्यक्ति को इसमें कोई कठिनाई नहीं आती।

आध्यात्मिक होने का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ ले। उसे अपने कर्तव्यों का पालन और जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। हम कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, पर जब तक हमें उन नियमों का ज्ञान नहीं हैं, जो मनुष्य के मनोवेग, भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण करते हैं तब तक हमारा ज्ञान अधूरा ही है।

मनुष्य को बाहरी वस्तुओं में ज्यादा आनंद मिलता है, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो इन सबसे ऊपर उठकर सूक्ष्मतर तत्वों की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। कुछ लोगों को भोजन में आनंद मिलता है, किसी को सुंदर वस्त्रों में आनंद मिलता है तो कुछ किसी संपत्ति के स्वामित्व में सुख का अनुभव करते हैं। इन सबसे हटकर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक चिंतन में ही परम आनंद की अनुभूति होती हैं।

मनुष्य आध्यात्मिकता के सागर में जितना गहरा उतरेगा, उसे उतने ही सुख के सीप प्राप्त होंगे। मनुष्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है। इसके लिए वह नैतिक-अनैतिक की भी परवाह नहीं करता। उसका एक ही लक्ष्य होता है, अधिक से अधिक भौतिक सुखों को प्राप्त करना। इसके विपरीत आध्यात्मिक आनंद, जो कि जीवन का असल आनंद है, की प्राप्ति के प्रति वह इतना गंभीर नहीं होता। वह स्थायी सुख से क्षणिक सुख को ज्यादा महत्व देता है।

भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए हम बाहर की ओर भागते हैं और आध्यात्मिक सुख के लिए अंदर की ओर। अध्यात्म की नौका पर सवार होकर ही मनुष्य संसार सागर से सफलतापूर्वक पार उतर सकता है। इस पृथ्वी पर करोड़ों प्रकार के जीव हैं, किंतु ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य को ही आध्यात्मिक आनंद का सुख प्रदान किया है। इसलिए मनुष्य को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होकर अपने इस जीवन को सफल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

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