Articles / लेख

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रामायण के पात्रों, घटनाक्रम और कथानक को लेकर कई ग्रंथ रचे गए हैं। रामायण के कई पहलू आज भी शोध का विषय हैं और दुनियाभर के विद्वान इन विषयों का लगातार अध्ययन भी कर रहे हैं। इन विषयों में एक विषय है सीता और रावण के संबंध का। कई विद्वानों का मानना है कि सीता और रावण पिता-पुत्री थे। हालांकि रामायण के सबसे प्रामाणिक ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ।  इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए।  लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था 'श्री कृष्ण जी का यदुवंश'।

धर्म ग्रंथों के अनुसार रावण के दो सगे भाई कुंभकर्ण और विभीषण के अलावा उनके एक सौतेले भाई भी थे जो की कुबेर थे। रामायण के अनुसार महर्षि पुलस्त्य ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनका विवाह राजा तृणबिंदु की पुत्री से हुआ था। महर्षि पुलस्त्य के पुत्र का नाम विश्रवा था। वह भी अपने पिता के समान सत्यवादी व जितेंद्रीय था। विश्रवा के इन गुणों को देखते हुए महामुनि भरद्वाज ने अपनी कन्या इड़विड़ा का विवाह उनके साथ कर दिया।

हमारी संस्कृति हमें धर्ममय जीवन जीना सिखाती है। हमारा जीवन सुखी, समृद्ध, आनंदमय बने इसके लिए संस्कार रचे गए और दिनचर्या तय की गई। दिनचर्या का आरंभ नींद खुलने के तत्काल बाद शुरू हो जाता है। दिन की शुरुआत का पहला कदम है- कर दर्शनम् अर्थात हथेलियों को देखना। सुबह उठते ही सबसे पहले हमें हथेलियों के ही दर्शन करना चाहिए। यहां जानिए क्या होता है सुबह-सुबह हथेलियों के दर्शन करने से...

 

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